
एक संस्था जिसे हम आप समर के नाम से जानते रहे हैं,उससे मेरा जुड़ाव लगभग उसके शुरुआती दिनों से रहा है।
पटना में अपनी सांस्कृतिक गतिविधियों के दौरान मेरी मुलाकात दो नौजवानों, अज़मी और सरफराज से हुई और उन्होंने ने ही मेरा परिचय समर से कराया।
मेरी सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र पटना इप्टा और पुनश्च रहा है,जिसकी शुरुआत मैने क्रमशः 1982 और 1984 में को थी। इसकी चर्चा करने का एक मात्र मकसद सिर्फ यह है कि समर से जुड़ते ही मुझे अपने शुरुआती दिनों की याद बरबस हो आई,क्योंकि यहां भी बहुत से नौजवान लड़के लड़कियों का एक बहुत ही उत्साही जमावड़ा मुझे देखने को मिला। नई उमर के इन नौजवानों में दुनिया – समाज और अपने आसपास के माहौल को लेकर जो चिंता,सरोकार और साथ ही उससे जूझने का जो जज़्बा मुझे देखने को मिला, वो मेरे लिए आज के 21वीं सदी के प्रतिस्पर्धी समाज में एक अनूठा उदाहरण था। इसने मुझे इस कदर आकर्षित किया कि समर से जुड़ाव को लोभ संवरण कर पाना मेरे लिए मुश्किल हो गया। हां, यहां ईमानदारी से यह भी बताना चाहता हूं कि इस जुड़ाव मे मुझ जैसों का एक स्वार्थ भी छुपा था ,वो यह कि हम जैसे लोगों की गुजरती हुई पीढ़ी में इन जुझारू नौजवानों से अपने लिए भी कुछ ऊर्जा हासिल कर लेने की बहुत गुंजाइश लगी।
जब एक बार समर और उनके कार्यक्रमों से जुड़े तो वो सिलसिला आज तक जारी है।इसकी भी सबसे बड़ी वजह समर का लगातार अपने काम को पूरी मुस्तैदी के साथ लगातार करते रहना भी है।
शुरुआत के इनके कुछ कार्यक्रमों में मेरी दिलचस्पी उतनी नहीं रही,मसलन समर स्कूल के छात्रों के बीच क्विज प्रतियोगिता कराते थे,जिससे मैं बहुत इत्तेफाक नहीं रखता था,लेकिन बाद में चलकर मुझे महसूस हुआ कि नए उमर के लोगों से तालमेल बनाने के लिए हमे प्रचलित और लोकप्रिय तरीकों का इस्तेमाल ही हमे उनके बीच अपनी बात रखने में सहायक होता है।
अब चुंकि मेरी गतिविधियों का मुख्य दायरा सांस्कृतिक रहा है,तो समर ने भी नाटकों की प्रतियोगिता,उसके लिए वर्कशॉप आयोजित करने का भी एक सिलसिला बनाया, जो काफ़ी कामयाब ही नहीं रहा बल्कि हमारे थियेटर के कई पुराने लोगों में वो चर्चा का विषय भी बना।
समर ने बीच बीच में विभिन्न तात्कालिक समस्याओं,मसलन पर्यावरण,सांप्रदायिकता,भूख,मानव अधिकार इत्यादि पर कई आवासीय कार्यशालाएं भी की हैं,जो इस तरह के छोटे और कम संसाधन वाले संगठन के लिए एक मुश्किल सा दिखने वाला काम है।फिर भी इन नौजवानों की टोली ने इन्हे सफलता पूर्वक किया।
आज के समय में जबकि देश और समाज जाति और ख़ासतौर से जबरदस्त साम्प्रदायिक दौर से गुज़र रहा है,वैसे में समर के साथियों ने समाज में व्याप्त दूरी को पाटने के सिलसिले में अपनी एक अनोखी सी दिखने वाली तरकीब ईजाद की है,जो वही इनका पुराना लोकप्रिय तर्ज पर काम करने का तरीका है।
समर पिछले कुछ सालों से पटना के एक कस्बाई इलाका नेउरा में क्रिकेट की प्रतियोगिता कराता है,जिसमे शामिल होने वाली टीम के लिए शर्त रखी गई है कि उसमे अनुपातिक रूप से पिछड़े और अल्पसंख्यक सदस्यों का रहना अनिवार्य है।यह आपसी सद्भाव बनाने वाला एक अपने किस्म का अनूठा प्रयोग है।
इधर हाल के कुछ वर्षों से समर ने पटना शहर के कई इलाकों के झोपड़पट्टियों में रह रहे वंचित समुदाय के बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू किया है।इसे भी समर के साथी पारंपरिक शिक्षा के साथ साथ कई प्रायोगिक (experimental) तरीके का भी इस्तेमाल बच्चों को पढ़ाई की रोचकता बनाए रखने में करते हैं।
आख़िर में यह बताना ज़रूरी लगता है कि एक संगठन, जिसकी शुरुआत साल 2004 में कुछ नौजवान लड़के लड़कियों ने आपस में बैठ कर बातचीत से शुरू की हो।वह संगठन आज इतने कम समय में इतने सारे बहुआयामी काम, इस जुझारू ढंग से बिना रुके लगातार करता चला आ रहा है और जिसने अभी तक अपनी सामाजिक, राजनीतिक,सांस्कृतिक पक्षधरता को लेकर कोई संदेह अपने में नहीं रखा है,उसके लिए यही मुहावरा बनता है कि,,,”आकाश ही सीमा है”,,,Sky is the limit,,,
